अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में भोलानाथ की रचनाएँ-

गीतों में-
उड़ रही है गंध
उन्माद
भैया जी
भेड़ियों के पहरों में
समय कहाँ मुझको

 

उन्माद

कब तक यह उन्माद चलेगा
कितना कौन पिये !

बाँह बाहुबल
झुठलाने को तुली हुई है खुली हथेली,
गाँठी गाँठी सधी हुई है रहमहीन वर्तुली पहेली,
अँगुली अँगुली खुली चुनौती
कितना
कौन जिये !

कब तक यह उन्माद चलेगा
कितना कौन पिये !

दया धर्म के
दिन झुठला कर बाँह चढी है नख की पीड़ा,
मन-मंसूबे-खोखल-करता-कुतर-रहा-दिल-घुन का कीड़ा,
छिन छिन छलनी होती छाती
कितना
कौन सिये !

कब तक यह उन्माद चलेगा
कितना कौन पिये !

१५ अप्रैल २०१३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter