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अनुभूति में भगवान स्वरूप सरस की रचनाएँ-

गीतों में-
आग से मत खेल
आदमी
और ऊँचे
जब-जब भी भीतर होता हूँ
तुम्हारे इस नगर में

 

तुम्हारे इस नगर में

क्या किया आकर
तुम्हारे इस नगर में

हादसे-सा उगा दिन
काँपे इमारत-दर-इमारत
हाशियों-से खिंचे जीने
चीखते सैलाब में
धँस कर अकेली
थाहती है ज़िन्दगी
पल-क्षण-महीने

बाँह से जुड़ती न कोई बाँह
जैसे, आगये हों हम
किसी बंदी शिविर में
क्या किया आकर
तुम्हारे इस नगर में

रोशनी के इंद्रधनुषों
पर लटकते
प्लास्टिक के फ्यूज़ चेहरे
धुंधलकों में
चरमराती गंध के आखेट
हिचकियों पर हाँफते
संगीत ठहरे

सभ्यता रंगीन दस्ताने पहन
धकिया गयी मासूमियत
को चीरघर में
क्या किया आकर
तुम्हारे इस नगर में

१५ दिसंबर २०१६

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