अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में बाबूराम शुक्ल की रचनाएँ-

गीतों में-
अंधड़ों के दौर
कैसे हो गुलमोहर सवेरा?
जहर आग
वक्त जालिम
क्षण अकेला

 

वक्‍त जालिम

हादसों ने इन दिनों,
कितना नहीं तोड़ा।

एक भर पाता न,
सौ-सौ घाव हो जाते।
क़त्‍लगाहों को भरो,
प्रस्‍ताव हो जाते।
गरदनों से छुरी ने,
रिश्‍ता नया जोड़ा।

तलफती संवेदना ज्‍यों
पर कटी चिडि़याँ
पी रहीं लोहू पिशाचिनि
ज़ुल्‍म की घडि़याँ
पीठ नंगी वक्‍त ज़ालिम
मारता कोड़ा।

९ मई २०११.

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter