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नये गीतों में-
एक एक बाल पर
गंध गीत
गोरस की मटकी
घोड़ा थका हुआ
वक्र रेखाएँ

गीतों में-
जंगल में रात
भोर
दोपहर
पात झरे हैं सिर्फ़
बच्चा कहाँ खेले
रात
संध्या

 

पात झरे हैं सिर्फ़

पात झरे हैं सिर्फ़
जड़ों से मिट्टी नहीं झरी।

अभी न कहना ठूँठ
टहनियों की उँगली
नम है।
हर बहार को
खींच-खींच कर
लाने का दम है।
रंग मरे है सिर्फ़
रंगों की हलचल नहीं मरी।
जड़ों से मिट्टी नहीं झरी।

अभी लचीली डाल
डालियों में
अँखुए उभरे
अभी सुकोमल छाल
छाल की गंधिल
गोंद ढुरे।
अंग थिरे हैं सिर्फ़
रसों की धमनी नहीं थिरी।
जड़ों से मिट्टी नहीं झरी।

ये नंगापन
सिर्फ़ समय का
कर्ज़ चुकाना है
फिर तो
वस्त्र नए सिलवाने
इत्र लगाना है।
भृंग फिरे हैं सिर्फ़
आँख मौसम की नहीं फिरी।
जड़ों से मिट्टी नहीं झरी।

२२ जून २००९

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