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अनुभूति में अमरनाथ श्रीवास्तव की रचनाएँ-

नए गीत
अनुपस्थिति मेरी

जहाँ आँखों में रहा
प्यादे से वज़ीर
फाँस जो छूती रगों को
मैं बहुत खुश हूँ

गीतों में-
पुण्य फलीभूत हुआ
लोग खड़े हैं इंतज़ार में
सारी रैन जागते बीती
 

  सारी रैन जागते बीती

असगुन के उल्कापातों में
सारी रैन जागते बीती

जो दिन उजले चंदन चर्चित
उसके लिए उपस्थिति वर्जित
हुईं कोयला स्वर्ण गिन्नियाँ
कालिख हुई थैलियाँ अर्जित

तीते रहे निबौरी सपने
मधु में उम्र पागते बीती

यह बेमेल संग की छाया
चमकाती है दुख की छाया
उतना ही बाँधे रखती है
जितना ही खुलती है माया

टाट लगे उखड़े मलमल को
सारी उम्र तागते बीती

प्यासे पाषाणों का होकर
लुप्त हो गया कोई निर्झर
उसके राग हुए वैरागी
जो ऐसी धारा पर निर्भर

बंद बाँसुरी की सुरंग में
विह्वल सांस भागते बीती

9 अगस्त 2007

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