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अनुभूति में आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' की रचनाएँ-

नई रचनाओं में-
आँखें रहते सूर हो गए
अपने सपने
चुप न रहें
मीत तुम्हारी राह हेरता
मौन रो रही कोयल
संध्या के माथे पर

गीतों में-
ओढ़ कुहासे की चादर
कागा आया है
पूनम से आमंत्रण
मगरमचछ सरपंच
सूरज ने भेजी है

दोहों में-
फागुनी दोहे

  मीत तुम्हारी राह हेरता

सुधियों के उपवन में तुमने
वासंती शत सुमन खिलाये.
विकल अकेले प्राण देखकर-
भ्रमर बने तुम, गीत सुनाये
चाह जगा कर आह हुए गुम
मूँदे नयन दरश करते हम-
आँख खुली तो तुम्हें न पाकर
मन बौराये, तन भरमाये.
मुखर रहूँ या मौन रहूँ पर
मन ही मन में तुम्हें टेरता
मीत तुम्हारी राह हेरता

मन्दिर मस्जिद गिरिजाघर में
तुम्हें खोजकर हार गया हूँ
बाहर खोजा, भीतर पाया-
खुद को तुम पर वार गया हूँ
नेह नर्मदा के निनाद सा
अनहद नाद सुनाते हो तुम-
ओ रस-रसिया!, ओ मन बसिया!
पार न पाकर पार गया हूँ
ताना-बाना बुने बुने कबीरा
किन्तु न घिरता, नहीं घेरता
मीत तुम्हारी राह हेरता

१९ अप्रैल २०१०

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