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संकलन में -
मेरा भारत- वह आग न जलने देना

 

रात की बात

रात की बात, रात को होगी

दिन भर की आपाधापी से
मन का दर्पण धुंधलाया है।
जिसने जितना दिया यहाँ पर
उसने उतना ही पाया है।

सबकुछ पा लेने की धुन में
सबके सब दिखते हैं रोगी।

सत्य एक होता है उसको
पाने वाले कम ही होते।
एक समय आता है जब हम
बिना चाह के सबकुछ खोते

ऐसे दुख में कभी न फँसता
केवल एक अकेला योगी।

वैसे तो दुख तरह तरह के
पर दौलत का दुख अजीब है
जो केवल पैसे पर मरता
वही यहाँ सबसे गरीब है

ऐसे दुख का अर्थ जानता
दुनिया में बस केवल भोगी।

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