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अनुभूति में डॉ. धर्मवीर भारती की रचनाएँ-

मुक्तक में-
चार मुक्तक

छंदमुक्त में-
आँगन
उत्तर नहीं हूँ
उदास तुम
उपलब्धि
एक वाक्य
क्या इनका कोई अर्थ नहीं
टूटा पहिया
तुम्हारे चरण
थके हुए कलाकार से
नवंबर की दोपहर
बरसों बाद उसी सूने आँगन में
प्रार्थना की कड़ी
फागुन की शाम
बोआई का गीत
विदा देती एक दुबली बाँह
शाम दो मनःस्थितियाँ
सुभाष की मृत्यु पर
सृजन

गौरव ग्रंथ में-
अंधायुग

विदा देती एक दुबली बाँह

विदा देती एक दुबली बाँह-सी यह मेड़
अंधेरे में छूटते चुपचाप बूढ़े पेड़

ख़त्म होने को ना आएगी कभी क्या
एक उजड़ी माँग-सी यह धूल धूसर राह?
एक दिन क्या मुझी को पी जाएगी
यह सफ़र की प्यास, अबुझ, अथाह?

क्या यही सब साथ मेरे जाएँगे
ऊँघते कस्बे, पुराने पुल?
पाँव में लिपटी हुई यह धनुष-सी दुहरी नदी
बींध देगी क्या मुझे बिलकुल?

१४ जुलाई २००८

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