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अनुभूति में भवानी प्रसाद मिश्र की रचनाएँ

गौरव ग्राम में-
इसे जगाओ
गीत फरोश
चार कौवे उर्फ़ चार हौवे
जाहिल मेरे बाने
दरिंदा
महारथी
मैं क्यों लिखता हूँ
स्नेह पथ
सतपुड़ा के जंगल
सुबह हो गई है

अंजुमन में-
हँसी आ रही है

संकलन में-
वर्षा मंगल - बूँद टपकी नभ से
गुच्छे भर अमलतास - मैं क्या करूँगा

  महारथी

झूठ आज से नहीं
अनन्त काल से
रथ पर सवार है
और सच चल रहा है
पाँव-पाँव

नदी पहाड़ काँटे और फूल
और धूल
और ऊबड़-खाबड़ रास्ते
सब सच ने जाने हैं

झूठ तो
समान एक आसमान में उड़ता है
और उतर जाता है
जहाँ चाहता है

क्रमश: बदली है
झूठ ने सवारियाँ

आज तो वह सुपरसॉनिक पर है

और सच आज भी
पाँव-पाँव चल रहा है

इतना ही हो सकता है किसी-दिन
कि देखें हम
सच सुस्ता रहा है
थोड़ी देर छाँव में
और

सुपरसॉनिक किसी झँझट में पड़कर
जल रहा है

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