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अनुभूति में कल्पना रामानी की रचनाएँ-

नये गीतों में-
काले दिन
गुलमोहर की छाँव
चलो नवगीत गाएँ
धूप सखी
ये सीढ़ियाँ

अंजुमन में-
कभी तो दिन वो आएगा
कल जंगलों का मातम
जिसे पुरखों ने सौंपा था
देश को दाँव पर
मन पतंगों संग
वतन को जान हम जानें

नई रचनाओं में-
अनजन्मी बेटी
ऋतु बसंत आई

जंगल चीखा चली कुल्हाड़ी
नारी जहाँ सताई जाए
बेटी तुम

भ्रमण पथ

दोहों में-
इस अनजाने शहर में
शीत ऋतु

 

शीत ऋतु

१
शीतल ऋतु आई सखी, पहन नए परिधान,
चलो दुशाला ओढ़कर, करें धूप का स्नान।

२
एक चटाई धूप की, डलिया भरकर बेर,
जन-मन को हर्षा गया, मौसम का यह फेर।

३
फटी बिवाई पाँव में, करे हवा हैरान,
नए रंग दिखला रहा, शीत नया मेहमान।

४
शीत प्रसाधन चल पड़े, भरने लगे बजार,
ढेरों लोशन क्रीम की, आई ब्रांड बहार।

५
सर्दी को भाने लगे, सूखे मेवे दूध,
जी भर कर सब खा रहे, हरे मटर अमरूद।

६
तम्बू ताने शीत ने, डाला आज पड़ाव,
गाँव गाँव दिखने लगे, जलते हुए अलाव।

७
थर थर काँपे रात दिन,शाम नहीं दिख पाय,
शीत लहर हड़का रही, समय सिकुड़ता जाय

२३ जनवरी २०११

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