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अनुभूति में विजय ठाकुर की रचनाएँ-

हास्य व्यंग्य में—
अड़बड सड़बड़
गुफ्तगू वायरस इश्क से
मेघदूत और ईमेल
स्वर्ग का धरतीकरण

छंदमुक्त में—
अपना कोना
काहे का रोना
कैक्टसों की बदली
तेरी तस्वीर
तीजा पग
दे सको तो
पीछा
प्रश्न
बचपन जिंदा है
मवाद
रेखा
वर्तनी


छोटी कविताओं में-
चकमा
जनता का प्यार
समानता

संकलन में-
गुच्छे भर अमलतास– ग्रीष्म आया
तुम्हें नमन– आवाहन

  अपना कोना

लम्हा–लम्हा तोड़कर,
जियो हर पल,
उड़ जाएगा
जीवन तरल।

कतरा–कतरा सोखकर,
पियो हर बूँद,
सूखेगा फिर
ये भव–समंद।

चप्पा–चप्पा छानकर,
महसूसो हर कोना,
संसार है
जीवन बिछौना।

खंगालो के शायद
कोई पल कोई बूँद
सिर्फ होगा तेरा अपना
कोई कोना इक सलोना।
 

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