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देहरी के अन्दर की यातनाएँ
दुर्योधन की बिछी बिसातें
टेढी चाल चलने वाले
मोहरों की तरह
आज भी
युधिष्ठिर को हराती हैं

वही बेढंगे सवाल
वही मेरे वजूद को
मेरे कपड़ों के दर से
बेधती हुई निगाहें

मेरे भावों
और अभावों
की उड़ती हुई खिल्ली
मुझे बाहर के झझांवतों से
कहीं ज्यादा सालती है।

२९ मार्च २०१०  

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