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कविताओं में-
उसकी खामोशी
कैसा आतंक
साथ
 

 

उसकी खामोशी

वह उसकी खामोशी को न सुन पाया
तो वह उसके
बोल कैसे समझ पाएगा
उसने जब उस शख़्स को
नहीं पहचाना
तो वह उसकी नज़रें कैसे पढ़ पाएगा
लोग इसकी बड़ी-बड़ी क़समें खाते हैं
पर सही मायने में
उसका मतलब नहीं जानते
वो क्या जाने ये वो मशाल है
तेज़ आँधी तूफ़ाँ से भी ना बुझे
वो क्या जाने
ये वो जंजीर है
जो तेज़ तलवार से भी ना टूटे
वो क्या जाने ये वो देव है
जो बेजान मे भी जान फूँक दे
वो नहीं जानते ये
वो बादल है
जो बिन बरसे चारों ओर
हरियाली फैला दे
ये वही दोस्ती है जिसके जिस्म में
हर साँस मे सारे राज़ छुपे हुए हैं
यही वो दोस्ती है जिसके बूते पर
जीवन रूपी इ
मारत शान से खड़ी है
यही वो दोस्ती है
जो सबका सामना करती है
हर डगर को
मोहक और सुगंधित कर देती है।

२४ मार्च २००८

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