अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में राय कूकणा की रचनाएँ

नई रचना
सबका लेखा सम अनुपाता

कविताओं में -
उम्मीद की बुढ़िया
रेत की मुट्ठी सा यह जीवन
स्वप्न सृजन
नवऋतु का सुनिश्चित अभिनंदन
समृतियों के सागर के मोती

 

स्मृतियों के सागर के मोती

डालियाँ जो फूलों की भेजीं थी तुमने
अपलक निहारा है घंटों उन्हें मैंने।

हर गुल की खुशबू को श्वासों में टंटोला
हर पल्लव की ताज़गी को आँखों में संजोया।

इनमें कुछ फूल तेरी महक थे बसाए
कामनाओं के चमन के रंगोली सजाए।

आते ही ऊँडेला हर रंग को कुछ ऐसे
हर चोट ने पाया हो मरहम का असर जैसे।

मर्माहत भृकुटि पर तनाव कम हुआ है
ज़ख़्मों की जेबों से रिसाव कम हुआ है।

कुछ कलियाँ इनमें अभी सिर्फ़ अधखुली हैं
संकुचाई-सी कनखियों से मेरे ज़ख़्म देखती हैं।

सोचता हूँ हर चोट का भी है अलग कुछ असर
सिर्फ़ चंद का ही दर्द दिया दिखाई ऊन्हें मगर।

जिस्मी ज़ख़्म तो शायद अब समय ही सहलाएगा
स्मृतियों के सागर के मगर मोती कौन लुटाएगा।

16 फरवरी 2005

 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter