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  पुत्र-वधू से

द्वार खडा हरसिंगार फूल बरसाता है तुम्हारे स्वागत मे,
पधारो प्रिय पुत्र- वधू!

ममता की भेंट लिए खडी हूँ कब से,
सुनने को तुम्हारे मृदु पगों की रुनझुन!
सुहाग रचे चरण तुम्हारे
, ओ कुल-लक्ष्मी,
आएँगे चह देहरी पार कर सदा निवास करने यहाँ,
श्री-सुख-समृद्धि बिखेरते हुए!

अब तक जो मै थी,  तुम हो,
जो कुछ मेरा है तुम्हें अर्पित!
ग्रहण करो आँचल पसार कर
, प्रिय वधू,
समय के झंझावातों से  बचा लाई हूं जो,
अपने आँचल की ओट दे,
सौंपती हूँ तुम्हें -
उजाले की परंपरा!
ले जाना है तुम्हें
और उज्ज्वल
, और प्रखर, और ज्योतिर्मय बनाकर
कि बाट जोहती हैं अगली पीढियाँ!

मेरी प्रिय वधू, आओ
तुम्हारे सिन्दूर की छाया से
अपना यह संसार और अनुरागमय हो उठे !

24 जून 2007

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