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अनुभूति में रामकृष्ण द्विवेदी 'मधुकर' की रचनाएँ—

अंजुमन में-
उफनाए नद की कश्ती
बढ़ाया प्रेम क्यों इतना

शिक्षा का संधान चाहिये

गीतों में-
बादल गीत

मोर पिया अब मुझसे रीझे

छंदमुक्त में—
किरन
जलकोश
जीवन सूक्त
दृष्टि
देखा है
नारी
प्रभात: दो रंग
पाँच छोटी कविताएँ
बुलबुला
साम्यावस्था
सावन

संकलन में-
हुए क्यों पलाश रंग रंगत विहीन

 

जलकोश

एक–एक बूँद
सहेजकर दी
जलद को रत्नाकर ने।
आशय हर कण–कण हो पुलकित
पाकर जलनिधि का मणिमय जल।
बरसा बादल
भीगा अंबर
या भीगे वे उन्नत स्थल
जो सकते थे जल को हर।
कितनी नग्न अरावलियाँ
जो छिपा जठर में कोलाहल
नित रहें देखती लगा टकटकी
जाते ऊपर से उड़ बादल।
जो ऊसर बंजर सदियों से
मरुस्थली काया है जिनकी
काँटे तन पर पथ पर काँटे
कोई क्यों कर ले सुधि उनकी।

१ अगस्त २००६

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