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अनुभूति में गुलशन गंगाधरसिंह सुखलाल की रचनाएँ-

पासवर्ड
बिकना इनवेंस्टमेंट था
समय का दाम

 

पासवर्ड

सुबह जब जागा
तो मोबाईल को चार्ज पर से निकाला और
ऑन करने के लिए कोड डाला
तैयार होकर ऑफ़िस पहुँचा
वहाँ दरवाज़े का कोड डालकर लाल बत्ति हरी की
फिर कंप्यूटर ने माँगा अपना पासवर्ड
और जब पैसे निकालने ए.टी.एम. तक पहुँचा
तो एक और…
कोड...

दिन भर के कामों को अनलॉक करता हुआ
जब शाम को घर पहुँचा
तो सीधे बिस्तर पर क्रैश हो गया
पड़ोसी, दोस्त और रिश्तेदार तो एंटर कर नहीं पाए
बीवी, बच्चों, माता पिता को भी मेरी दुनिया में
एक्सैस मिला नहीं...

ज़िंदगी में बेमानी हो चली
कुछ भावनाओं, नर्मियों को
दिल के जिस फोलडर में रखा था
उसका पासवर्ड...
मैं कहीं भूल गया।

24 दिसंबर 2007

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