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का से कहूँ

का से कहूँ दरद मोरे दिल की
दूर भयीं गलियाँ बाबुल की

छूटे मीत कुदुम्ब अरु छूटे
रिश्तों के बंधन भी टूटे
छोटी पड़ी आँचल माई की
का से कहूँ दरद मोरे दिल की

उमड़-घुमड़ बदरा बरसाए
बिजुरी से अम्बर भरी जाए
न आई महक मालदा लंगड़े की
का से कहूँ दरद मोरे दिल की

तीरथ व्रत त्यौहार सब छूटे
चैता फगुआ औ' सावन के झूले
चौखट देवालय की बनी परजन की
का से कहूँ दरद मोरे दिल की

भैया-भगिनी दूर हुए अब
सपने आँचल के चूर हुए अब
फीकी पड़ी हुंकार पिता की
का से कहूँ दरद मोरे दिल की

३१ मई २०१०

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