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अनुभूति में सुरेन्द्र प्रताप सिंह की
रचनाएँ -

छंद मुक्त में-
खामोश हो जाता हूँ मैं
ज़िंदगी कविता या कवयित्री
पत्थर
ये सिमटते दायरे
विचार
श्रद्धा

 

 

खामोश हो जाता हूँ मैं

मस्तिष्क रूपी समंदर में
शब्द तैरते रहते हैं
आता है ज्वार-भाटा
और शब्द
डूब जाते हैं
खो जाते हैं लहरों में
और
खामोश हो जाता हूँ
मैं !

३ मई २०१०

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