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अनुभूति में सुकेश साहनी की
रचनाएँ -

छंद मुक्त में-
अंततः
उस एक पल के लिए
एक औरत का कैनवस
किसी भी बच्चे की माँ के लिए
चिनगारियाँ
रचते हुए
लड़ता हुआ आदमी
विरासत
हाँ मैं उदास हूँ
 

  अंतत:

उसने जला डाला
मेरा घास–फूस का घर
पर नहीं जला पाया
पैरों तले की धरती
और
सिर पर का आसमान
उसने लगवा दिए ताले
मेरे होठों पर
पर नहीं रोक सका मेरे
रोम छिद्रों से बहता पसीना
झल्लाकर
उसने काट डाले मेरे

हाथ और पैर
फिर भी डोलता रहा आसन
मेरे दिल की धड़कनों से
अन्तत:
उसने झोंक दिया मुझको
अंसख्य–असंख्य माँओं की कोखें
जहाँ से मेरे
निरन्तर बने रहने की
प्रक्रिया जारी हैं।

१६ फरवरी २००९

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