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सिलसिला

आदमी
आजीवन सीखता है
सलीका
छुटपन में
बड़ी अँगुली थामकर
नन्हे कदमों से/ नापता है
आँगन का दायरा,
रटता है
परिभाषाएँ/घर/आँगन/सड़क की।
लड़कपन में-
समझता है
छुटपन की रटी
परिभाषाओं के अर्थ
फिर/जब 'आदमी' हो जाता है तो
रचता है
नई परिभाषाएँ-
घर/आँगन/सड़क
और
आदमी की।

२ अगस्त २०१०

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