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कविताओं में-
उम्मीद
तिमिर
तुम
नये पैगाम
क्षितिज से परे

संकलन में
गुच्छे भर अमलतास- बूढा लकडहारा

  क्षितिज से परे

क्षितिज से परे, जाने कब चला जाऊँ,
शायद तुम्हें, ना कभी मिल पाऊँ।
ऐ दोस्त, दिल की दिल में रह जायेगी,
क्या पता ये पाती, तुझ तक आ पायेगी।

जमाने से ना कहेना, मैंने साथ छोडा,
दोस्ती को मैंने, ना कभी यूँ तोड़ा।
एक मुकाम जिन्दगी में ऐसा होता है,
पाने जिसे इन्सा, जिन्दगी खोता हैं।

१ फरवरी २००१
 

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