अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में राजन स्वामी की रचनाएँ-

अंजुमन में-
अधूरेपन का मसला
धूप से तप रहे जंगल
बातें

बुझा बुझा-सा है
मुश्किल है

छंदमुक्त में-
चश्मा
जब पिताजी थे
नन्हीं बिटिया की डायरी से

 

अधूरेपन का मसला

अधूरेपन का मसला ज़िंदगी भर हल नहीं होता,
कहीं आँखें नहीं होतीं, कहीं काजल नहीं होता।

कहानी कोई भी अपनी भला पूरी करे कैसे?
किसी का आज खोया है, किसी का कल नहीं होता।

रहे आदत पसीना पोंछने की आस्तीनों से,
मयस्सर हर घड़ी महबूब का आँचल नहीं होता।

अजब है दिल्लगी कि सौ बरस की ज़िंदगी में भी
जिसे दिल ढूँढता है, बस, वही इक पल नहीं होता।

सभी से तुम लगा लेते हो उम्मीद-ए-वफा़ लेकिन,
लिए पैगा़म सावन का हरेक बादल नहीं होता।

१० मई २०१०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter