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रचनाएँ -

छंदमुक्त में-
गंतव्य
ठहरो एक निमिष
दृष्टिबंध
मुग्धा
स्नेहिल स्पर्श
स्वप्न
 

 

मुग्धा

जिससे
आरक्त हों कपोल
वह दृष्टि है
अनमोल।
अर्द्धोन्मीलित आँख
सपन संसार की
खुली अब पांख।
भाव का स्पंदन
स्फुरित अंग-अंग
साकार है अनुबंध।
मंद मंथर उतरती
प्राणों में
प्रिय तुम्हारी
कुंवारी देह गंध।

२४ जुलाई २००६

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