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अनुभूति में पद्मा मिश्रा की रचनाएँ

छंदमुक्त में-
आओगे न बाबा
खामोशियाँ
जागो मेरे देश
माँ
शीत से काँपती

` शीत से काँपती

शीत से काँपती सहमी दीवारों पर
धूप के नन्हे नन्हे टुकड़े
चितकबरे से
जैसे खेलते लुकाछिपी का खेल
कुछ शरारती बच्चे
झर रही है नीम की पत्तियाँ
सर सर मर मर‌...
बदलते मौसम के गीत गाती धरती
करती है स्वागत-नये सूरज का
और भावनाओं का तपता सूरज
उतर रहा धरती के हरित अंचल पर
धीरे... धीरे... धीरे...!
पिघलती-बिखरती धूप के मृगछौने
बतिया रहे हैं- जहाँ तहाँ
और थरथराती शीत गुम हो रही है
धरती कुछ और सँवरती
गुनगुनाती-सी, तप‌ उठती है
युगों से वहीं खड़ी, प्रिय सूरज के
स्वागत में
युगों से, युगों तक?

१ फरवरी २०२२

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