अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में कविता गुप्ता की रचनाएँ—

नयी रचनाओं में-
आसमान छूता बालक
चिड़िया
बिजूका
महसूसता हूँ गर्व
यह कौन सा वृक्ष है

छंदमुक्त में-
पिघलने के बाद
यों ही नहीं रोती माँ
राख का ढेर

  पिघलने के बाद

आदमी पता नहीं क्या क्या बनाता है
कांच व लोहे को पिघलाकर
फिर भी जाता है पर्वत–शिखरों पर
हिमखंडों को पिघलता हुआ देखने

हिमखंड तो हिमखंड हैं
वह पिघल जाता है स्वयं ही गर्मी पाकर
और आदमी
लोहे और कांच जैसी चीज को पिघला देता है जबरन
किन्तु
नहीं देखता पिघलाकर उसे
जिसे कहते हैं दिल
दिल‚ जो पिघल कर बह उठता है नदी की तरह
और बुझाता है प्यास धरती की
धरती‚ जिसमें उष्णता है‚ जिसमें स्निग्धता है और न जाने क्या–क्या
धरती तो धरती है
जो बुला लेती है
पर्वत–शिखरों पर से भी हिमखंडों को अपने पास
मगर
पिघलने के बाद।

१६ अक्तूबर २००४ 

 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter