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यात्रा से मुक्ति कहाँ

होने को तो, पृथ्वीलोक की भी, अभी तक ठीक ही रही
अब अटैची तैयार करें, आगामी यात्रा के लिए।
यात्रा वही श्रेष्ठ रहती हैं,
जिसमें सामान का बोझ न्यूनतम हो,
पृथ्वीलोक में रहते हुए हँसकर यो रोकर,
हल्का हो जाना ज़रूरी था,
साथ में हो भार किंतु पापों का बिलकल न हो,
वैसे सब लेखा जोखा चित्रगुप्त रखेंगे,
हमें चिंता किस बात की।
वहाँ उखाड़ पछाड़ तो न रहेगी
जैसी पृथ्वीलोक में रही,
ताकत कितनी लगाई,
उखड़ते उखड़ते टिक सके थे पाँव
डूबे अब डूबे, हिचकोले खाती रही नाव,
जबकि यह यात्रा समाप्त होने वाली है
शुरू कर दें बाँटना, सब जो बटोरा था
अन्यथा लूट लिए जाएँगे, अंतिम पड़ाव पर।
यात्राएँ क्रमवार होने के लिए होती हैं,
जब तक आ नहीं जाता, अपना स्थायी निवास।
दशकों चलते-चलते यात्रांत जब आ चला,
क्यों रखें मोह विगत मार्ग से, भले तन का,
रह लिए बहुत यहाँ, धन्यवाद सहयात्रियों,
सबको हार्दिक नमस्कार,
चलें पुनः यात्रा पर,
क्या लें सामान साथ, चलें क्यों न खाली हाथ,
वहाँ सब होगा प्रबंध,
वहीं के आदेश से आए थे यहाँ,
स्थानांतरों-नियुक्तियों का उद्गम वही तो है,
मुख्यालय चलें बंधु, वही है अंतिम पड़ाव।

२५ फ़रवरी २००८

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