अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में विवेक चौहान की रचनाएँ-

अंजुमन में-
कभी पास अपने
गगन पूरा तड़पता है
गमों का दौर है जो अब
नजर मुझसे मिला लो तुम
न मेरा दिल सँभलता है

 

न मेरा दिल सँभलता है

न मेरा दिल सँभलता है, न मेरा दम निकलता है
तुझे दिल में बसा करके, ये मेरा दिल धड़कता है

बरसता है सुनो सावन, सनम तेरी जो यादों का
बहुत रोता हूँ मैं गौरी ये मेरा दिल मचलता है

मैं सुनता हूँ कभी तेरी वो पायल की जो छनछन को
मेरा दिल खूब रोता है तो ये आँसू बिखरता है

जो आती हो सनम ओढ़े हुए चूनर वो तुम पीली
तुम्हीं को देख करके रंग तब मौसम बदलता है

कभी आओ मेरे सीने से लगकर बाँहों में भर लो
तुम्हारे ही लिये सुन लो कवी सजता सँवरता है
 

१ अप्रैल २०१७

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter