अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में विनोद तिवारी की रचनाएँ-

नई रचनाओं में-
कुछ इस क़दर
चलते जाने का धर्म
ज़मीन पाँव तले
सड़कें भरीं

हर दिशा में

अंजुमन में-
आपस में लड़कर
काल की तेज़ धारा
देखे दुनिया जहान
पल निकल जाएँगे

 

कुछ इस कदर

कुछ इस क़दर ग़ुबार भरे दिन हैं आजकल
हर सुबह नया आफ़ताब माँग रही है

देखो, उठो, इतिहास की पुस्तक को टटोलो
जलदी करो जनता जवाब माँग रही है

वे मुँह खुले, वे हाथ उठे, वे क़दम बढ़े
युग-चेतना अपना हिसाब माँग रही है

ख़्वाबों के खिलौनों से बहुत खेल चुकी है
हर झोंपड़ी ताबीरे-ख़्वाब माँग रही है

सदियों की भूख का विकल्प दे सको तो दो
वरना ये भीड़ इन्क़िलाब माँग रही है

२८ फरवरी २०११

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter