अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में डॉ. योगेन्द्र दत्त शर्मा की रचनाएँ-

अंजुमन में-
कंचन की खंजन की
तू क्यों सूली पर चढ़ा
मेहराब थी जो सिर पे
वो मन के कितना करीब था

  तू क्यों सूली चढ़ा जा

तू क्यों सूली चढ़ा जा रहा, क्या तू कोई ईसा है?
यह क्या कम है, कानों में दुनिया उंडेलती सीसा है!

लोग तरक्की करते-करते कितने आगे निकल गए,
तू क्यों कहता दौर हमारा गुज़री हुई सदी-सा है।

कल तक तो वह चेहरा था कश्मीर की घाटी-सा सुंदर,
अब वह चेहरा चक्रवात में उजड़ा हुआ उड़ीसा है।

तू उस ईश्वर की तलाश में कहाँ-कहाँ पर भटक रहा,
सच तो ये है, तेरा घर ही काबा और कलीसा है।

बिस्मिल्ला ने शहनाई में कैसा जादू घोल दिया,
फिर बरसों के बाद अचानक ज़ख़्म पुराना टीसा है।

रौंदे हुए शहर के लोगों के मेले क्या, उत्सव क्या,
रातें पहियों ने कुचली हैं, दिन चक्की ने पीसा है।

एक हवा का झोंका है वो, तपते हुए मरुथल में,
इस रेतीले महानगर में, उसका नाम नदी-सा है।

५ अक्तूबर २००९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter