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अनुभूति में डॉ. वशिष्ठ अनूप की रचनाएँ-

अंजुमन में-
जो भूखा है
फूल की खुशबू
सहमी सी पायल
होठों से अमृत

 

फूल की खुशबू

फूल की खुशबू हवा की ताजगी खतरे में है
लोक गीतों की खनकती ताजगी खतरे में है

सभ्यता इस दौर की है नर्वसन होने लगी
आदमीयत गुम रही है आदमी खतरे में है

पानी पानी को तरसती सोच में डूबी नदी
हो रही हर रोज दूषित जिंदगी खतरे में है

पत्थरों के जंगलों में पल रहे विषधर तमाम
प्यार में डूबी हुई निश्छल हँसी खतरे में है

लोग अब करने लगे हैं यूँ अँधेरे को नमन
चाँदनी सहमी हुई है रोशनी ख़तरे में है

दिन ब दिन रंगीन होता जा रहा संसार यूँ
इन दिनों सदियों सराही सादगी खतरे में है

२९ जून २००९

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