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दोहों में-
मन (१६ दोहे)

नई ग़ज़लें-
उसको अगर परखा नहीं होता
क्या करता
जब मैं छोटा बच्चा था
गूँगे का बयान
दर्द तो जीने नहीं देता मुझे
दिल नहीं करता
हम जैसे यारों से यारी
तेरे शहर में
वो तो जब भी ख़त लिखता है

अंजुमन में-
आस इक भी
खुद से जुदाई
हैं अभी आए

 

 

हम जैसे यारों से यारी

हम जैसों से यारी मत कर
खुद से यह गद्दारी मत कर

तेरे अपने भी रहते हैं
इस घर पर बमबारी मत कर

रोक छलकती इन आँखों को
मीठी यादें खारी मत कर

हुक्म उदूली का खतरा है
फरमाँ कोई जारी मत कर

आना जाना साथ लगा है
मन अपना तू भारी मत कर

खुद आकर ले जाएगा वो
जाने की तैयारी मत कर

सच कहने की ठानी है तो
कविता को दरबारी मत कर

'श्याम' निभानी है गर यारी
फिर तो दुनियादारी मत कर

२३ जून २००८

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