अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में क़ैश जौनपुरी की रचनाएँ-

अंजुमन में-
उजड़े हुए चमन
वो जाने कहाँ हैं
हम तुम्हारे अब भी हैं
हम तेरे हो गए

हम दिल से हैं हारे

कविताओं में-
दुनिया बहुत आगे जा चुकी है
वो बुड्ढा

 

वो जाने कहाँ हैं

दूर तक निगाह में खामोशियाँ हैं
सामने गुलाब है पर वो जाने कहाँ हैं

गुलाब की खुशबू गुलाब-सी रंगत
है जिनके पास वो जाने कहाँ हैं

ख़्वाबों में आते हैं जो ख़्वाब बनकर
मैं ढूँढूँ उन्हें पर वो जाने कहाँ हैं

मेरे ख़्वाब उनकी ही गलियों में खोये
हम जिनमें खोये वो जाने कहाँ हैं
दूर तक निगाह में. . .

चमन में हैं फूल उनमें हूँ मैं भी
मगर जो हैं माली वो जाने कहाँ हैं

उनके संदेशे का है इंतज़ार
जो हैं डाकिए वो जाने कहाँ हैं

उठती हैं नज़रें क्यों राहों की जानिब
मेरा हमसफर तो न जाने कहाँ हैं

9 दिसंबर 2007

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter