अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में अशोक रावत की रचनाएँ—

नई रचनाएँ—
अँधेरे इस क़दर हावी हैं
ज़ुबां पर फूल होते हैं
भले ही उम्र भर
ये तो है कि
शिकायत ये कि

अंजुमन में—
इसलिए कि
डर मुझे भी लगा
तूफ़ानों की हिम्मत
थोड़ी मस्ती थोड़ा ईमान
नहीं होती
फूलों का परिवार
बड़े भाई के घर से
मुझको पत्थर अगर
विचारों पर सियासी रंग
संसद में बिल
हमारी चेतना पर

 

बड़े भाई के घर से

बड़े भाई के घर से आ रहा हूँ,
गया ही क्यों था अब पछता रहा हूँ।

कोई दुश्मन नहीं है भाई है वो,
मैं अपने आपको समझा रहा हूँ।

ये बच्चे हैं कि सुनते ही नहीं हैं,
मैं कितनी देर से चिल्ला रहा हूँ।

मुझे भी तोड़ कर ले जाए कोई,
मैं अपनी शाख पर उकता रहा हूँ।

ज़माने को जहाँ जाना है जाए,
मैं अपने रास्ते पर जा रहा हूँ।

गिला फिर भी नहीं है दोस्तों से,
भले ही रोज़ धोखे खा रहा हूँ।

१ अप्रैल २००६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter