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उलझे उलझे अपने रिश्ते
ऊपर से सख़्तजान
तय सफ़र कुछ यों भी करना
देख सारे हिसाब
मुझमें इतने खोए आँसू
रौशनी का जब कभी आभास
वो धोखा दे गया

अंजुमन में--
अंधेरों में चमकता
कौन समझेगा
खुद से मिलकर
जो उजालों में
तुम्हें झूठ से बहलाने में
सिर्फ और सिर्फ

हिसाब मत देना
 

 

खुद से मिलकर

खुद से मिलकर हो रही है आज हैरानी बहुत
मन नहीं लगता कहीं भी है परेशानी बहुत

झेलने की दर्दो गम को और गुंजाइश नहीं
सह चुका है मन मेरा दुनिया की मनमानी बहुत

चाहता हूं मैं तड़प के साथ अश्कों की नमी
यूँ तो बारिश में भी गिरता है यहाँ पानी बहुत

वो हसीं देखे हुए तो एक मुद्दत हो गई
लग रही है मुस्कुराहट भी ये अनजानी बहुत

जाने क्यों आँखों से आँसू बहने को बेताब हैं
धड़कनें किस बात की खातिर हैं दीवानी बहुत

मेरे कहते ही ये मंजर सब समझ जाओगे तुम
पर है मुश्किल बात ये मुश्किल है कह पानी बहुत

ठीक है अद्भुत जिया है तूने ग़ज़लों का हुनर
पर तेरे अशआर में है अब भी नादानी बहुत

२८ जनवरी २००८

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