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अभिव्यक्ति  

२२. ३. २०१०

अंजुमन । उपहार । काव्य संगम । गीत । गौरव ग्राम । गौरवग्रंथ । दोहे । पुराने अंक । संकलन । हाइकु
अभिव्यक्ति । हास्य व्यंग्य । क्षणिकाएँ । दिशांतर । नवगीत की पाठशाला

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दूर तक धुँधलका1
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  दूर तक धुँधलका है,
अंधकार छलका है,
कैसे हर सपना सहलाएँ?
फैले सन्नाटे में,
अलग-अलग हैं खेमे,
कहाँ-कहाँ दर्द गुनगुनाएँ?

रोप रहे नागफनी
विष जीवी मिल-जुल कर,
संवेदन हो गया निरर्थक,
बहती विपरीत हवा
फेंक रही सिर्फ जहर,
विकृत हैं ह्रदय और मस्तक,
हार गए मंत्र-सिद्ध
मंडराते रहे गिद्ध,

आसमान कैसे गर्जाएँ?
कहाँ-कहाँ दर्द गुनगुनाएँ?

बढ़ते जाते तनाव
फँसकर आवर्तों में,
सभी ओर पनप गया जंगल,
अग्नि शिखर पर बैठे
जीना है शर्तों में,
अर्थहीन लगता है हर पल
चलते हैं चक्रवात,
डाल-डाल पात-पात

उलझी गति कैसे सुलझाएँ?
कहाँ-कहाँ दर्द गुनगुनाएँ?

--भगीरथ बडोले

इस सप्ताह

गीतों में-

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गीतों में-
वीरेन्द्र आस्तिक

अंजुमन में-
पुरु मालव

छंदमुक्त में-
सचिन श्रीवास्तव

दोहों में-
हरे राम समीप

पुनर्पाठ में-
प्रेमचंद्र सक्सेना 'प्राणाधार'


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प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन¸ कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन
-|- सहयोग : दीपिका जोशी
   
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