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अभिव्यक्ति १५. १२. २००८

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विकास पटनेकर की कलाकृति

जाने कितने साल हो गए

  अब तो सुबह शाम रहते हैं
जबड़े कसे हुए
जाने कितने साल हो गए
खुल कर हँसे हुए

हर अच्छे मज़ाक की कोशिश
खाली जाती है
हँसी नाटकों में
पीछे से डाली जाती है

काँटे कुछ दिल से दिमाग़ तक
भीतर धँसे हुए
जाने कितने साल हो गए
खुल कर हँसे हुए

खा डाले खुदगर्ज़ी ने
गहरे याराने भी
आप आप कहते हैं अब तो
दोस्त पुराने भी

मेहमानों से लगते रिश्ते
घर में बसे हुए
जाने कितने साल हो गए
खुल कर हँसे हुए

- वीरेंद्र जैन

इस सप्ताह

गीतों में-

पुनर्पाठ में-

अंजुमन में-

छंदमुक्त में

हास्य व्यंग्य में-

पिछले सप्ताह
८ दिसंबर २००८ के अंक में

गीतों में-
मदन मोहन 'अरविन्द'

पुनर्पाठ में-
रामानुज त्रिपाठी

अंजुमन में-
अमर ज्योति 'नदीम'

छंद मुक्त में-
विजय कुमार सप्पत्ति

हास्य व्यंग्य में-
मुकेश पोपली

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प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन¸ कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन
-|- सहयोग : दीपिका जोशी
 
३०,००० से अधिक कविताओं का संकलन
 
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