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        रथ विजय का

 
रथ विजय का बढ़ रहा है
कर्म के झंडे तले

स्वप्न बनकर सारथी
जब हाँक देते देह को
चेतना होती सजग
तजती अलस के नेह को
राम हैं आदर्श जिसके
दीप सा वह नित जले

धैर्य का उत्साह से
होता जहाँ सुखकर मिलन
मातु दुर्गा हैं वहीं
परिपूर्ण कर देतीं लगन
आत्मा की आस मधुरिम
गोद में इनकी पले

- कुमार गौरव अजीतेन्दु
१ अक्टूबर २०२१

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