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        विजयादशमी

 
साथ हर्ष उल्लास असंभव
हुआ मनाना
फिर कैसे संसार मनाए
विजयादशमी

रक्तबीज स्वच्छंद घूमते
धरकर रूप अनोखे
महिषासुर भी आज सुना है
पुजते देव सरीखे
राम तेरे आदर्श तिरोहित
कर कलियुग में
दशकंधर अवतार मनाए
विजयादशमी

कितने ही संग्राम नित्य हैं
जारी मन के अंदर
नवल निराले युद्ध रोज ही
लड़ते मनुज निरंतर
मन के जीते जीत मंत्र ये
प्रतिदिन जपते
झंकृत मन इस बार मनाए
विजयादशमी

गूंज उठी है रणभेरी अब
वक्त नहीं सोने का
युद्धभूमि ललकार रही है
दिन विजयी होने का
चलो उठो ओ वीर बहादुर
शस्त्र सहेजो
विजय नाद हुंकार मनाए
विजयादशमी

- अमित खरे
१ अक्टूबर २०२१

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