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वर्षा महोत्सव

वर्षा मंगल
संकलन

तूफ़ान के समय

क्षितिज से उठ कर
विषैले बादलों में सनसनाता आता है तूफ़ान
झुलसती कोटरों में चिड़ियाँ टहनियाँ पेड़ों की!

झुका लूँगा शीश तब
उड़ाए झुलसाएगा जब तूफ़ान
यह रुखे सूखे बालों को।
शीश पर सह लूँगा
वेग सब प्रकृति के विकृत तूफ़ान का।

कड़कती उल्का आकाश में
विचलित करती है मानव में अंतर्हित ज्योति को।

बढूँगा आगे और
शांत होगा, जब विष वातावरण
अथवा यों शीश झुका
खड़ा हुआ अचल, एकांत स्थल पर,
देखूँगा भस्मसात होती है कैसे वह अंतर्ज्योति,
पाता है जय कैसे,
मानव पर कैसे यह विकृत प्रकृति का तूफ़ान।

- रामविलास शर्मा
11 सितंबर 2001

  

डरा पक्षी

काँपते रात के तूफ़ान में
बिजली की चौंध में
नष्ट नीड़ देख कर
वह लौटा घर निराश।

विश्व सिकुड़ गया था तब
कोई दूसरा नहीं
जो अपने जैसा रहा
नहीं ढूँढ़ता अब कोई।

भूमि बहुत अलग-सी थी
रेत थी मकान थे
ध्रुव ऋतु समान-सी
न धूप थी न चाँदनी।

खिड़की से जब देखता
बंधु उछल रहे
पंख भरते उड़ान
यह दृश्य सोचकर।

नल की फुहार बनी
उसकी बरसात अब
सुदूर भूले देश में
रिमझिम पानी गिर रहा।

- सुभाष काक
24 अगस्त 2001

 

 

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