अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर


घटाएँ
 

 

छा गये सारे गगन पर
नव घने घन मिल मनोहर,
दे रहे हैं त्रस्त भू को
आज तो शत-शत दुआएँ!

देख लो, कितनी
अँधेरी हैं घटाएँ!

कर रहा है व्योम गर्जन,
मंद्र ध्वनि से, वाद्य-सा बन,
चाहता देना सुना जो आज
सारी स्वर-कलाएँ!

देख लो, ये
व्योम-चेरी हैं घटाएँ!

अरुक बरसो बिन्दु जल के
तीव्र गति से, ना कि हलके,
विश्व भर में वृष्टि कर दो, दूर
हों सारी बलाएँ!

देख लो,
कितनी घनेरी हैं घटाएँ!

- महेन्द्र भटानागर
२१ जुलाई २०१४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter