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शुभ दीपावली

अनुभूति पर दीपावली कविताओं की तीसरा संग्रह
पहला संग्रह
ज्योति पर्व
दूसरा संग्रह दिए जलाओ

धरा पर गगन

खुशियों की बौछार खिलखिलाता मौसम आया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया

देवालय पर पूर्ण चन्द्रमा अनहोनी यह बात
दीप जल रहे लगता निकली तारों की बारात
फुलझड़ियों की माला नीहारिकाओं का आभास
फूट रहे पटाखे बम चलते कदमों के पास

युवकों की शरारत मस्ती का आलम छाया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया

चरणों में लक्ष्मी मैया के झुक झुक जाता माथ
मिठाइयाँ सूखे मेवे ले लेते भर भर हाथ
भागे दुख जंजाल छा गई दीप पर्व की माया
गोल घूम रहे ग्रह नक्षत्र स्वर्ग यहां लो आया

इन्द्रलोक की उर्वशी का नृत्य उतर आया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया

खेल रहे खिलौनों से बन वायुयान के चालक
नई नई पोशाक अकड़ते खेल रहे हैं बालक
इंतजार था महीनों से कि कब आये दिवाली
लटक मटकते झूम बजाते दो हाथों से ताली

तोतली बोली शिशुओं की कितना आनन्द समाया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया।

हरिहर झा
9 नवंबर 2007

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