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        रोशनी के फूल
 
हर्ष के पाहुन हमारे द्वार खटकाने लगे
रोशनी के फूल देखो खूब
मुस्काने लगे

छू गई आकर धरा को व्योम की लो, स्वर्ण-रेखा
हो गई निशि स्वयं मोहित इंद्रधनुषी चित्रलेखा
चंचला करने लगी हैं रश्मियाँ अठखेलियाँ
अब बहुत मायूस अँधियारे
नजर आने लगे

सजे रंगोली बँधे अब द्वार वन्दनवार घर घर
जगमगाएँ देहरी पर स्वागतम के दीप तत्पर
जिन घरों में हों अँधेरे चलो ज्योतित करें उनको
स्याह रातों के समंदर सिमटकर
जाने लगे

एक कोना एक आँचल रह न जाए कहीं खाली
दीप्त हों चेहरे सभी के मने तब अनुपम दिवाली
हो यही संकल्प आओ बाँट दें सबको उजाले
एक मावस हँसी जब तो सूर्य
शरमाने लगे

- प्रो.विश्वम्भर शुक्ल
१ नवंबर २०२६

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