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        न रौंदें दीप बाती को
 
न रौंदें दीप-बाती को

ये माटी है
वो माटी है मैं माटी हूँ तू माटी है
मिले माटी से हँस माटी है परिपाटी यही खाँटी
निभाना है सनातन को मनाना है पुरातन को
न अधुनातन कभी भूले-सजाना है मनांगन को
न बिसरे स्नेह की पीड़ा पढ़ो
गुमनाम पाती को


ये भाती है
वो भाती है पराई क्यों लुभाती है?
कभी घर में जलाती है कभी टुकड़े कराती है
न हो संबंध ही प्रतिबंध मन का मन से हो अनुबंध
न टूटें प्यार के झूले- दिया-बाती फलक छू ले
जलें तो साथ हिल-मिलकर चलें ले
संग सँगाती को

ये राधा वो
सकीना है मैं मुँदरी वो नगीना है
पराया कौन सब अपने प्रीति का इत्र भीना है
रहे गंगो-जमुन मिलती घराँगन में खुशी खिलती
मने सावन कभी फागुन रहें खुशियाँ अगिन पलती
नयापन नित बुलाती को समझ
नव्या विजाती को

- संजीव वर्मा सलिल
१ नवंबर २०२६

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