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        प्रेम-दीप
 
प्रेम-दीप हम चलो जलाएँ निज अन्तर्मन में
द्वेष दंभ छल तम मिट जाए
नव अभिनंदन में

दीप्त देह से फिर उजियारा कर्मों का फैले
धुल जाये आबद्ध चित्त जो भ्रम में है मैले
ज्योतित हो फिर करुण प्रेमरस
उर के दर्पण में

आलोकित पुरुषार्थ पुंज से भू परिमंडल हो
चिर प्रदीप से दिग दिगंत तक कणकण उज्ज्वल हो
कुटिल वृत्तियों के चंचल पग
जकड़े बन्धन में

विषम तटों के तट बन्धों से दीवारें जोड़े
कलुष भेद के निंदित बंधन आओ हम तोड़े
रुचिर प्रेम की सघन उर्मियाँ
थिरके चिंतन में

- भीमराव 'जीवन'
१ नवंबर २०२६

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