अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

         आज लगा


आज लगा बाकी दिन
कितने रूखे हैं

अँगनाई अगियार करेगी पुरखों की
गुड़-घी की मन्नत है, उनकी बरसों की
चन्दा मामा जल्दी लड़ियाँ टाँग रहे
दीवट-ताखों के मुँह
सूखे-सूखे हैं

चौक पूरने सरयू का जल आया है
त्रेता से बेड़िया गागर भर लाया है
गौरा सतिया रचती देहरी देख रही
पुए पूर के दिये
बिचारे भूखे हैं

पनपियाव में खील बताशे गट्टे हैं
रेहू ने रेहुआये लक-दक लत्ते हैं
पिढ़ई अक्षत-हल्दी से कनफुसक रही
लछमी मइया कितनी
लछमी 'मूखे हैं।

- विनय विक्रम सिंह मनकही
१ नवंबर २०२४
 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है