अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

         मैं माटी का दिया


मैं माटी का दिया !

कूटा-काँड़ा गया शुरू में
पीटा-पाटा गया बीच में
केवल थोड़ा पानी पीकर
आधा जीवन रहा कीच में
एक अनोखे कलाकार से-
सुन्दर रूप लिया
मैं माटी का दिया !

फिर आयी तपने की बारी
कर ली कठिन तपस्या भारी
प्रभु ने ऐसा वर दे डाला
कच्चे को पक्का कर डाला
होठों पर अंगार सजाकर
अमृत पान किया
मैं माटी का दिया !

मैं हूँ जग में एक अकेला
जिसने जीवनभर दुख झेला
बाती-तेल मिले फिर जलकर
अंत किया जीवन का मेला
यही परम सन्तोष उजाला दे
अँधियार जिया
मैं माटी का दिया !

अपने जैसे भोले-भाले
अनगिन दीप जलाये मैंने
महलों से लेकर कुटिया तक
आँगन-द्वार सजाये मैंने
घोर अमा की छाती पर-
बोया उत्सव का बिया
मैं माटी का दिया

- उमा प्रसाद लोधी
१ नवंबर २०२४
 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है