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          प्रकाश का पर्व दिवस


यह प्रकाश का पर्व दिवस है
दीप दिवाली है

एक अमावस के आँगन का
हुआ अँधेरा मौन
नाच रहा खुशियों का पर्वत
ढोल बजाए कौन
जले दीप की लौ सूरज के
लब की लाली है

मोबाइल के हेडफोन में
दीवाली-नवगीत
आसमान के अट्टहास के
तारों के संगीत
झालर का इतिहास बड़ा ही
गौरवशाली है

छोड़े बहुत पटाखे घर की
तेज़ हुई आवाज़
बहुरंगी राॅकेटों की है
सुरुचिपूर्ण परवाज़
सड़क किनारे तिरपालों का
बटुआ खाली है

- शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'
१ नवंबर २०२४
 

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