अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

         अवनि का शृंगार कर लें


दीप की अवली बनाकर अवनि का शृंगार कर लें
ज्योति का उत्सव मनाएँ दीप सा
व्यवहार कर लें

तन, ये माटी दीप जैसा मन की बाती जगमगाये
स्नेह पूरित तेल इसमें लोक-मन का तम मिटाए
प्रेम फैलाये उजाला और हम
उपकार कर लें

भाव के रंग भर रँगोली हृदय की देहरी सजाएँ
प्रीत बंदनवार संग, सौहार्द की छवि झिलमिलाएँ
सृष्टि में फैली अमाँ लघु-दीप से
उजियार कर लें

चल पड़ीं अल्हड़ हवाएँ मूक दर्शक हैं दिशाएँ
बज उठी वीणा मधुर, हैं गूँजती पावन ऋचाएँ
इस धरा से उस गगन तक प्रेम का
विस्तार कर लें

कालिमाएँ स्याह चादर ओढ़ कर बैठी हुई हैं
कलुषताएँ मन के भीतर बेवजह ऐंठी हुई हैं
थी अभी तक धुंध पर अब ज्योतिमय
संसार कर लें

कामना अज्ञानता के भवन की चेरी रही है
लालसाएँ भ्रमित, उनकी सत्य से दूरी रही है
आओ हिलमिल सत्य, सुंदर, शिवं को
गलहार कर लें

- डॉ मंजुलता श्रीवास्तव
१ नवंबर २०२४
 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है