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          आशाओं के दीप


तम की अवधि हुई है लम्बी
उजियारों को पास बुलाएँ
तारों के कंदील बाँध कर
चिर ज्योति से धरा सजाएँ

धुआँ धुआँ हैं दसों दिशाएँ
भटकी भटकी उड़ें हवाएँ
बैर द्वेष की धूल बुहारें
जल थल नभ निर्मल कर जाएँ
चलो अमन के दीप जलाएँ

बारूदों की गंध हवा में
चीत्कार और रुदन हवा में
अग्नि वर्षा रुके कभी तो
टूटा जन विश्वास जगाएँ
आशाओं के दीप जलाएँ

धूप बिखेरे नेह की गर्मी
चंदा बाँटे शीतल नरमी
बदली छिटके रंग प्यार के
इक दूजे को गले लगाएँ
मन से मन की ज्योत जलाएँ

सागर नदिया अमृत पेय हो
धरती अम्बर मंगलमय हो
जन जन निर्भय, कण कण सुखमय
ज्योति कलश भू पर छलकाएँ
दीपों का संसार बसाएँ

- शशि पाधा 

१ नवंबर २०२३
   

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